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आचार्य श्री तुलसी का दूसरी बार सूरत पदार्पण एवं दीक्षा समारोह


6 दिसम्बर 1967 को आचार्य श्री सूरत के एक उपनगर 'शान्तिनिकेतन सोसायटी' पहुंचने वाले थे। मार्ग में अमरोली गांव के प्रधानाध्यापक ने आचार्यश्री से कुछ समय शाला के विद्यार्थियों के लिए दें ऐसा अनुरोध किया। वहां स्कूल के छात्र आचार्य श्री की प्रतीक्षा कर रहे थे। आचार्यश्री ने थोडे समय में उनको जीवन- निर्माण की अमूल्य बातें बताई।

ताप्ती नदी को रेलवे पुल द्वारा पार करके आचार्य श्री शान्तिनिकेतन सोसायटी पहुंचे। सूरतवासियों ने अन्तःकरण की श्रद्धा से आचार्यश्री का स्वागत किया। आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में अणुबम से संत्रस्त मानवता को उबारने के लिए अणुव्रत का रास्ता दिखाया। मध्याह्न में आई० सी ० गांधी स्कूल के छात्रों और अध्यापकों ने आचार्यश्री को सुना। रात्रि में सन्तों के संगीत और कविताओं के बाद आचार्यश्री ने प्रवचन किया। आचार्यश्री ने एक विशाल जुलूस के साथ सूरत में प्रवेश किया। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि सब जाति और सम्प्रदाय के लोग सड़क के दोनों ओर खड़े थे। सनातन हॉल में पहुंचने पर जुलूस स्वागत-सभा के रूप में परिणित हो गया। उस समय सूरत में वैदिक धर्म के प्रमुख संत डोंगरेजी महाराज पधारे हुए थे । हरिओम आश्रम के पूज्य मोटा भी वहीं थे। आचार्यश्री के आगमन को सूरतवासी त्रिवेणी संगम के रूप में देख रहे थे। जो लोग प्रयाग के त्रिवेणी संगम (गंगा-यमुना सरस्वती) पर तीर्थ-यात्रा के लिए जाते थे, उन्हें घर बैठे ही तीर्थ मिल गया। अध्यात्म की उस त्रिवेणी में लोगों ने अपने अन्तःकरण की कलुषता धोने का प्रयास किया।

अणुव्रत पलायन नहीं सुधार ः

नागरिक अभिनन्दन स्वीकार करने के बाद आचार्यश्री ने जनता को उद्बोधन दिया। 'परिवर्तन के नाम से मैं आप लोगों को सन्यासी या पद-यात्री बनाना नहीं चाहता। व्यापार-धंधा छुड़ाना भी मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं चाहता हूं कि मनुष्य जिस व्यवसाय और व्यवहार से संपृक्त है, उसमें सुधार कर ले। अणुव्रत आपको पलायन का नहीं, सुधार का रास्ता दिखलाता है। इसी दिन मध्याह्न में शिक्षक सम्मेलन का आयोजन था। सूरत के सब विद्यालयों से कुल 868 शिक्षक-शिक्षिकाएं प्रवचन- पण्डाल में उपस्थित थे। शिक्षा निदेशक श्री नटवरभाई देसाई ने इस सम्मेलन को आयोजित करने में सर्वाधिक रुचि ली।

सूरत के प्रांगण में तेरापंथ धर्म संघ का प्रथम दीक्षा समारोह

10 दिसम्बर 1967 को रत्नसागर जैन विद्यालय के विशाल प्रांगण में दीक्षा समारोह का आयोजन था। दीक्षार्थिनी बहन कान्ताकुमारी कई वर्षों से साधना कर रही थी। उसकी तीव्र अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए आचार्य श्री ने आर्ष वाक्यों का उच्चारण करते हुए बहन को दीक्षित किया। बहन के जीवन का एक नया अध्याय शुरु हुआ! दर्शक लोगों को त्याग का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। वह सूरत के प्रांगण में तेरापंथ धर्म संघ का प्रथम दीक्षा समारोह था। साध्वी कुंथु श्री की दीक्षा यहां सम्पन्न हुई। 

एक अविस्मरणीय स्मृति

सूरत में आचार्य श्री ने पांच दिन प्रवास किया। वहां आचार्यश्री के कार्यक्रमों का सार्वजनिक क्षेत्रों में अच्छा स्वागत हुआ। शहर का वातावरण अणुव्रतमय बन गया। जन-जन के मुंह पर आचार्य तुलसी और अणुव्रत की चर्चा थी। स्थानीय समाचारपत्रों ने इस दिशा में उल्लेखनीय वातावरण बनाया। अखबारों के कुछ शीर्षक ये 'सनातन हॉल में अद्भुत दृश्य, प्रजा के प्राणों को पारसमणि का स्पर्श कराने के लिए आचार्यश्री तुलसी का आगमन' आदि-आदि।

आचार्यश्री के प्रवास के अंतिम दिन। चार दिनों के प्रवास में यहां का जन-मानस आचार्यश्री के विचारों से परिचित और प्रभावित हो चुका था। यहां के समाचारपत्रों ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा 'आचार्यश्री तुलसी अपने स्वल्पकालीन प्रवास में सूरतवासियों पर ऐसा अमिट प्रभाव छोड़‌कर जा रहे हैं, जो कभी भुलाया नहीं जा सकता।"

सूरत गुजरात के प्रसिद्ध शहरों में से एक है। यहां जैन-जैनेतर सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं। तेरापंथ के विशिष्ट श्रावकों में से एक स्वर्गीय श्री मगनभाई सूरत में ही रहते थे। गुजरात और मुम्बई की तरफ साधु- साध्वियों के यातायात का स्त्रोत खोलने का श्रेय वकीलवाला परिवार को है। इस काम में मगनभाई का विशेष आग्रह और सहयोग रहा। उन्होंने अपने जीवन काल में सैंकड़ों व्यक्तियों को तेरापंथ दर्शन की ओर आकृष्ट किया। उस समय यहां कुसुमभाई झवेरी प्रभावशाली व्यक्ति थे। उनके अनुरोध को स्वीकार कर आचार्य श्री ने उनके निवास स्थान में रात्रि कालीन प्रवास किया।

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