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आचार्य श्री तुलसी वर्ष 1954 में पहली बार पधारे सूरत

Jain Terapanth Acharya Tulsi


प्रथम चरण स्पर्श 30 मई 1954

एक समय था जब तेरापंथ धर्मसंघ राजस्थान की सीमाओं तक ही सीमित था। अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री तुलसी ने आचार्य पद पर प्रतिष्ठापित होने के बाद वर्ष 1936 से 1946 तक सभी चातुर्मास एवं मर्यादा महोत्सव थली क्षेत्र में ही किये। 1949-50 में आप की प्रथम जयपुर यात्रा हुई उसके बाद हरियाणा एवं दिल्ली को आपने अपना विहार क्षेत्र बनाया। वर्ष 1953-54 क चातुर्मास जोधपुर और मर्यादा महोत्सव राणावास करवाया। राणावास मर्यादा महोत्सव के बाद आपने मुम्बई को लक्ष्य में रखकर यात्रा प्रारम्भ की। वाव और अहमदाबाद का स्पर्श करते हु 30 मई 1954 को आप सूरत पधारे। तब तक सूरत में तेरापंथी साधु-साध्वियों के चार चातुर्मास प्रवास हो चुके थे, लेकिन तेरापंथ के आचार्यों का यह प्रथम चरणन्यास था ।

सूरत यात्रा का वर्णन आचार्य श्री तुलसी की अपनी कलम से

अहमदाबाद का साप्ताहिक प्रवास पूरा कर 16 मई 1954 को हमने वहां से प्रस्थान किया। 21 मई को हम बड़ोदा पहुंचे । मार्ग में राजपथ के दोनों ओर गहरे हरे-भरे पक्तिवद्ध खड़े अशोक वृक्ष पथिकों को आकृष्ट कर रहे थे। वहां का प्राकृतिक सौन्दर्य मन को प्रभावित करने वाला था। बड़ोदा में सार्वजनिक सभा संस्थाओं के संचालकों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में शहर के प्रायः सभी लोग उपस्थित थे। दो दिन वहाँ रुक कर हमने भरूच के लिए प्रस्थान किया। 27 मई 1954 को हम भरुच पहुंचे। वहां नर्मदा नदी बह रही थी। नदी पर लगभग एक मील लम्बा दर्शनीय पुल बना हुआ था। नदी पार करते ही मौसम में परिवर्तन आ गया। गर्मी और लुओं से छुटकारा मिल गया। भरूच से सूरत की और जाते हुए हमने तापी नदी पार की। 30 मई 1954 को हम सूरत पहुंच गए।

सूरत में तीन दिन

गुजरात का प्रसिद्ध औद्योगिक नगर सूरत। हमारे पूर्वाचार्यों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि तेरापंथ के आचार्य सूरत जा सकेंगे। मेरे सामने भी ऐसा कोई लक्ष्य नहीं था। किन्तु सूरत में तेरापंथ को प्रसारित करनेवाले श्रावक मगनभाई की यह आकांक्षा थी कि मैं सूरत आऊँ। उन्होंन आखिरी बार रामगढ़ में दर्शन किये थे। मैंने उनसे पूछा 'मगनभाई' अब तुम्हारी कौन सी इच्छा शेष रही है ? मगनभाई बोले गुरुदेव मेरी सब इच्छाएं पूरी हो गई है। केवल एक इच्छा बाकी है। मैं सूरत में आपका पदार्पण देखना चाहता हूँ। उनके जीवन काल में तो उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। पर उनका संजोया हुआ सपना साकार हो गया, इस बात की मुझे प्रसन्नता है। जिस सूरत में साधु-साध्वियों का पहुंचना कठिन था, वहा आचार्यों का आगमन वास्तव में आश्चर्य का विषय था। सूरत के लोगो से मगनभाई का विशेष सम्पर्क था। अपने दादा आनन्दभाई के साथ उन्होंने गुजरात में तेरापंथ के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय काम किया था।

सूरत में हमारा प्रथम कार्यक्रम विठ्ठलवाड़ी में हुआ । शहर के संभ्रान्त नागरिकों एवं विभिन्न संस्थाओं के लोगों ने श्रद्धा के साथ हमें सुना। सूरत के प्रसिद्ध पत्रकार एवं जनसेवी कार्यकर्ता ईश्वरभाई देसाई ने युगीन परिस्थितियों में एक जैनाचार्य के ससंघ आगमन को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया। मैंने अपने प्रवचन में अणुव्रत की चर्चा की। उपस्थित जनसमूह ने अनेक प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासाओं को समाहित किया ।

सूरत में हमारा प्रवास गोपीपुरा स्थित दीपचन्द निवास में हुआ। उस समय वहां तेरापंथी परिवार बहुत कम संख्या में थे। फिर भी हमारे व्यापक मिशन की जानकारी प्राप्त कर शहर के बहुत लोग लाभान्वित हुए। मुम्बई से समागत तेरापंथ के शिष्टमंण्डल ने मुम्बई चातुर्मास के लिए प्रार्थना की । खानदेश से समागत लगभग चार सौ लोगों ने खानदेश आने का अनुरोध किया। उस समय चातुर्मास की घोषणा तो नहीं की गई, पर मैंने मुम्बई आने की स्वीकृती दे दी। सूरत के लोग चाहते थे कि हम वहां कुछ अधिक समय रहें। किन्तु जून के दूसरे सप्ताह तक मुम्बई में मानसून की संभावना को देखते हुए वहां अधिक रुकना संभव नहीं था। जून के प्रथम दिन सायंकाल वहां से प्रस्थान कर दिया।

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