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वैर बढ़ाने वाली होती हैं कामनाएं : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

वैर बढ़ाने वाली होती हैं कामनाएं : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

जैन विश्व भारती के द्विदिवसीय वार्षिक अधिवेशन का रहा मंचीय उपक्रम

अच्छी गति-प्रगति कर रहा है जैन विश्व भारती : आचार्यश्री महाश्रमण 

गुरु सन्निधि में सूरत के 28 स्कूल के विद्यार्थियों ने दी अपनी प्रस्तुति, प्राप्त किया मंगल आशीष

26.09.2024, गुरुवार, वेसु, सूरत (गुजरात) :


डामण्ड सिटि सूरत में भव्य चतुर्मास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में अभी भी निरंतर संस्थाओं के अधिवेशन का क्रम भी जारी है तो उसके साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु जनता संघबद्ध रूप में उपस्थित होकर पावन आशीर्वाद प्राप्त कर रही है। गुरुवार को आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में एक ओर जहां जैन विश्व भारती के द्विदिवसीय वार्षिक अधिवेशन का उपक्रम रहा तो दूसरी ओर सूरत के लगभग 28 विद्यालयों के विद्यार्थियों ने उपस्थित होकर आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। 

गुरुवार को महावीर समवसरण से भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आयारो आगम में कहा गया है कि आदमी कामासक्त होता है, कामनाओं से ग्रस्त होता है। ऐसा आदमी वैर को बढ़ाने वाला होता है। अपने आपको दुःखी बनाना, पाप कर्मों का बंधन करना भी स्वयं के प्रति वैर बढ़ा लेने की बात होती है। कामनाओं की पूर्ति होते ही आगे की कामना हो जाती है। यदि कामनाओं की पूर्ति नहीं होती आदमी के मन में आक्रोश भी आ सकता है। किसी आदमी में सत्ता प्राप्ति की कामना, किसी को धन प्राप्ति की कामना, किसी को यश-ख्याति की कामना आदि-आदि अनेक प्रकार की कामनाएं पनपती रहती हैं। कामनाओं का होना ही दुःख का कारण होता है। 

कामनाओं के कारण होने वाले दुःख से बचने व उसे कम करने के लिए मानव को अपनी कामनाओं को कम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी अपने जीवन में अच्छे कार्य में पुरुषार्थ करे और उन अच्छे कार्यों के द्वारा भौतिक पदार्थों की कामना नहीं करना चाहिए। कई बार पुरुषार्थ के बाद भी प्रतिफल प्राप्त हो जाए, यह कोई जरूरी नहीं होता। इससे भी आदमी को दुःखी नहीं बनना चाहिए। कर्म करने के बाद भी यदि मनोनुकूल फल नहीं भी मिले तो भी आदमी को समता व शांति में रहने का प्रयास करना चाहिए। 

आदमी को अपने पुरुषार्थ में कमी नहीं रखना चाहिए, परिणाम हाथ की बात नहीं। साधु-साध्वी भी यदि कई लोगों पर ध्यान देने के बाद भी एक भी मुमुक्षु तैयार नहीं कर सके तो सोचना चाहिए कि सबको जोड़ लेना और धर्म से जोड़ देना मेरे क्षेत्र की बात नहीं। इसलिए आदमी को अनपेक्षित कामनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को जीवन में पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। कामना भी हो तो आत्मकल्याण की कामना हो तो जीवन का अच्छा क्रम बन सकता है। 

आचार्यश्री की अनुज्ञा से मुनि उदितकुमारजी ने तेरापंथ दर्शन और तत्त्वज्ञान के संदर्भ में साध्य और साधन पर अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। 

सूरत के लगभग 28 स्कूल के विद्यार्थियों ने ‘बदले युग की धारा’ गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में आशीष प्रदान करते हुए कहा कि शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी विद्यार्थियों को प्रदान किया जाता रहे। विद्यार्थियों के जीवन में अच्छे गुणों और संस्कारों का विकास होता रहे। 

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