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इन्द्रिय विषयों में आसक्त रहना अनुश्रोत तो त्याग साधना प्रतिस्त्रोत


21.09.2024, शनिवार, वेसु, सूरत (गुजरात) :


शनिवार को महावीर समवसरण में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनमेदिनी को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि दो शब्द हैं-अनुश्रोत और प्रतिश्रोत। संसार के प्रवाह में बहना, इन्द्रिय विषयों में आसक्त रहना अनुश्रोत तथा त्याग, संयम और साधना के पथ पर चलना प्रतिश्रोतगामिता होती है। जिस दिशा में पानी का प्रवाह हो उस दिशा में तिनका भी बहता है, पानी की धारा के विपरित चलना, आगे बढ़ना प्रतिश्रोतगामिता होती है, जीवित होने की निशानी होती है। सामान्य आदमी अनुश्रोत में चलने वाला होता है। इन्द्रियों विषयों में आसक्त रहने वाला हो सकता है। साधु, साधक श्रोत के प्रतिकूल चलने वाला होता है। 


अध्यात्म का मार्ग श्रोत के विपरित चलने वाला पथ है। मेरा, मेरा का भाव, ममत्व, पदार्थों में आसक्ति, पदार्थों का आसक्ति के साथ उपभोग करना सामान्य आदमी की चर्या हो सकती है। जो साधु है, जो अनगार है, वह द्रष्टा है, पदार्थों के प्रति ज्ञाता-द्रष्टा भाव रखता है। जीवन को चलाने के लिए यदि किसी पदार्थ का उपयोग भी करता है तो उसका भाव होता है, और वह परिग्रह की आसक्ति से स्वयं को बचाने का प्रयास करता है। गृहस्थ अपने घर को चलाने का प्रयास करता है, शादी-विवाह, भरण-पोषण, परिवार की चिकित्सा, सुरक्षा, भोजन-पानी आदि की व्यवस्था करनी होती है और वह स्वयं आसक्त भाव से आसेवन करता है। 


गृहस्थ आदमी अपने जीवन में यह प्रयास रखे कि अपने जीवन में साधु नहीं भी बन पाए तो समयानुसार निवृत्ति की दिशा में आगे बढ़ जाए। सेवा साधक श्रेणी की बात है। इसका शिविर भी चल रहा है। यह भी साधना का अंग है। परिवार और समाज में रहते हुए भी अनासक्त भाव में रहने का प्रयास है। धार्मिक-आध्यात्मिक सेवा के साथ अपनी साधना भी चले, कुछ निवृत्ति और कुछ प्रवृत्ति हो। ज्यादा मूर्च्छा, आसक्ति न हो। जितना हो सके, कषाय से मुक्त व्यवहार करने का प्रयास करना चाहिए। कषाय और आसक्ति जितना प्रतनु बन सके, ऐसा प्रयास करना चाहिए। 

आचार्यश्री ने विशेष प्रेरणा करते हुए सेवा साधक के श्रेणी के लोग हैं तो सेवा निष्काम भाव से हो तो सेवा में शुद्धता रह सकती है। सेवा करके नाम कमाने का प्रयास सेवा में शुद्धता की कमी हो सकती है। सेवा में शुद्धता के लिए सेवा के साथ कामना न जुड़े। सेवा के साथ साधना करने वाला सेवा साधक हो सकता है।

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