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यौवन का धार्मिक-आध्यात्मिक क्षेत्र में होता रहे सदुपयोग: महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी ने युवाओं को दी विशेष प्रेरणा

16.08.2024, शुक्रवार, वेसु, सूरत (गुजरात) :

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के सूरत शहर में चतुर्मास करने से सूरत की सूरत ही बदल गयी है। डायमण्ड व सिल्क सिटि के रूप में विख्यात यह शहर आध्यात्मिक शहर के रूप में भी ख्यापित हो रहा है। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में वर्तमान में तेरापंथ धर्मसंघ की ‘संस्था शिरोमणि’ तेरापंथी महासभा के त्रिदिवसीय सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। इसमें देश-विदेश के लगभग 525 क्षेत्रों 1800 से अधिक संभागी बन रहे हैं। सम्मेलन के दूसरे दिन शुक्रवार को भी महावीर समवसरण उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ प्रतिनिधि संभागियों से जनाकीर्ण बना हुआ था। 

शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से उपस्थित विशाल जनमेदिनी को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में यौवन (युवावस्था) महत्त्वपूर्ण होता है। इस अवस्था में बहुत कार्य किया जा सकता है। गृहस्थ जीवन में अर्थार्जन, सामाज अथवा राजनीति में कार्य कर सकता है। जवानी की अवस्था बहुत कार्यकारी भी हो सकती है और जवानी की अवस्था में रास्ता गलत ले लिया जाए तो यह अवस्था पतन के गर्त में ले जाने वाली भी सिद्ध हो सकती है। इसलिए यौवन भी अनर्थकारी हो सकता है। कहीं धन-सम्पत्ति अनर्थ करने वाली हो सकती है तो कहीं कोई लौकिक सेवा में योगदान देने वाली भी बन सकती है। किसी की चिकित्सा, किसी की शिक्षा, समाज की सेवा में भी लगकर कल्याणकारी भी बन सकता है। एक-एक वस्तु का दुरुपयोग भी हो सकता है और सदुपयोग भी हो सकता है, उसका शुक्लपक्ष भी हो सकता है और कृष्णपक्ष भी हो सकता है। तीसरी बात प्रभुत्व की बताई गई है कि किसी को सत्ता मिल जाए, वर्तमान लोकतंत्र में कोई मंत्री बन जाए, किसी पद पर चला जाए तो इसमें भी कोई सत्ता का सदुपयोग कर सकता है तो कोई सत्ता का दुरुपयोग भी कर सकता है। सत्ता में ईमानदारी से कार्य करना, लोगों का कल्याण करना, जनता का सेवा करना सदुपयोग माना जाता है। इसी प्रकार मानव का अविवेकी हो जाना अनर्थकारी ही होता है। 

यौवन, सत्ता, प्रभुत्व व धन आदि के साथ विवेक जुड़ जाए तो वह कल्याणकारी हो सकता है। आयारो आगम में बताया गया कि अवस्था जा रही है तो आदमी को यह चिंतन करना चाहिए कि वह अपने जीवन का धार्मिक-आध्यात्मिक उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी परिवार के भरण-पोषण के लिए कार्य करता है तो उसके साथ-साथ उसे धार्मिक-आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भी गति करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन और परिवार को चलाने के लिए अन्य कार्य करने के साथ समय-समय पर धार्मिक अनुष्ठान जैसे सामायिक, ध्यान, जप आदि में समय लगाने का प्रयास करना चाहिए। जितना समय मिल सके, अपने धार्मिक कार्य से जुड़ने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार आदमी के जवानी पर धर्म का अंकुश बना रहे। वृद्धावस्था आने पर तो आदमी को अपना अधिक से अधिक समय धार्मिकता में लगाने का प्रयास करना चाहिए। उम्र और जवानी का जागरूकता के साथ सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। 

मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने आख्यान क्रम को भी संपादित किया। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने जनता को उद्बोधित किया। तदुपरान्त तपस्वियों ने अपनी-अपनी तपस्या का प्रत्याख्यान किया। जैन विश्व भारती द्वारा साध्वी मुक्तियशाजी द्वारा लिखित शासनश्री साध्वी रतनश्रीजी के जीवनवृत्त ‘अप्रमत्त ज्योति’ को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया। प्रो. मिश्रीलाल माण्डोत द्वारा लिखित ‘आधुनिक राजस्थान की महान विभूतियां’ के दूसरे भाग को भी आचार्यश्री के सम्मुख लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने दोनों पुस्तकों के संदर्भ में आशीर्वाद प्रदान किया गया। 

महासभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री हितेन्द्र मेहता द्वारा तेरापंथ विश्व भारती-मुम्बई के परिसर के प्रस्तावित मास्टर प्लान की वीडियो प्रस्तुत की गई। इस संदर्भ में आचार्यप्रवर ने कहा कि जैन विश्व भारती, अणुव्रत विश्व भारती और प्रेक्षा विश्व भारती भी गुरुदेवश्री तुलसी के सामने आई थी। इस बार तेरापंथ विश्व भारती की सामने आई। जब हमारा चतुर्मास के बाद भ्रमण प्रारम्भ हुआ तो तेरापंथ विश्व भारती का स्थान अधिग्रिहित किया गया, वहां जाना हुआ और कार्यक्रम भी हुआ। मैंने उसकी स्थापना की बात उस दिन बताई थी। यह तेरापंथ विश्व भारती के प्राणतत्त्व धार्मिक-आध्यात्मिक गतिविधियों के रूप में देख रहे हैं। महासभा ट्रस्ट आदि महासभा से जुड़े हुए लोग खूब अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक कार्य करते रहें। 

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