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कामनाओं के दमन का प्रयास करे मानव : मानवता के मसीहा महाश्रमण

कामनाओं के दमन का प्रयास करे मानव : मानवता के मसीहा महाश्रमण

मानव के कल्याण के लिए अपनी विशाल पदयात्रा अद्वितीय : केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री

आचार्यश्री ने जलशक्ति मंत्री को प्रदान किया पावन पाथेय

22.09.2024, रविवार, वेसु, सूरत (गुजरात) :


जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, मानवता के मसीहा आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में रविवार को केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री तथा भाजपा के गुजरात राज्य प्रदेशाध्यक्ष श्री सी.आर. पाटिल उपस्थित हुए। उन्होंने आचार्यश्री को वंदन कर पावन आशीर्वाद प्राप्त करने के उपरान्त आचार्यश्री की मंगलवाणी श्रवण भी करने के साथ ही अपनी भावनाओं को भी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें पावन पाथेय भी प्रदान किया। 

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को महावीर समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि आयारो आगम में बताया गया है कि काम का अतिक्रमण करना मुश्किल होता है। काम शब्द का प्रयोग अनेक प्रकार के कार्यों के संदर्भ में होता है तो काम एक अर्थ कामना के संदर्भ में भी होता है। इन्द्रिय विषय के संदर्भ में भी काम शब्द का प्रयोग होता है। यहां कामना के संदर्भ में प्रयोग किया गया है। कामना होती है तो आदमी पदार्थों का संग्रह करता है, पदार्थों का परिग्रह रखता है। 

इच्छा काम के अंतर्गत सोना, चांदी आदि पदार्थों को प्राप्त करना, धन, मकान, पदवी आदि आते हैं। दूसरा बताया गया मदन काम। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि की कामना मदन काम है। काम अनंतकाल से प्राणी के भीतर रहती है। इसलिए इस काम का पार पाना मुश्किल भी होता है। इच्छाओं को कम करना, लोभ का क्षय तथा संतोष को धारण करना बड़ा कठिन काम होता है। 

लोभ को पाप का बाप कहा जाता है। कितने-कितने पापों के जड़ में लोभ ही होता है। लोभ के कारण हिंसा में जा सकता है। लोभ के कारण आदमी झूठ बोल सकता है, छल-कपट कर सकता है। यहां तक कि लोभ के कारण आदमी किसी की हिंसा भी कर सकता है। इस कारण काम दुःख का भी बहुत बड़ा कारण है। कामनुवृद्धि के कारण शरीर और मन दोनों को दुःखी बनाने वाला हो सकता है। जो प्राणी वीतराग बन जाता है, वह दुःख का पार पा सकता है। काम अध्यात्म की साधना में परित्याज्य होता है। साधना की गहराई में जाने से कामनाओं का पार भी पा सकता है। आदमी को अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। भौतिक इच्छाओं की सीमा रखनी चाहिए। स्वदार, भोजन व धन में संतोष रखने का प्रयास करना चाहिए तथा अध्ययन, जप और दान में संतोष नहीं करना चाहिए। 

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