जीवन को अध्यात्म से भावित बनाने को आचार्यश्री ने दिया पावन पाथेय
श्री, लज्जा, धैर्य, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी रूपी गुणों से युक्त हों कन्याएं : आचार्यश्री महाश्रमण
20 वें कन्या मण्डल अधिवेशन में कन्याओं को साध्वीप्रमुखाजी ने दी मंगल प्रेरणा
28.08.2024, बुधवार, वेसु, सूरत (गुजरात) :
बुधवार को महावीर समवसरण में उपस्थित जनता व अधिवेशन में सम्मिलित कन्याओं को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जो आदमी परिग्रही होता है, परिग्रह में अनुरक्त रहता है, मोह-माया की दुनिया में रमण करने वाला होता है तथा बाह्य आकर्षणों से आक्रान्त रहता है, इन्द्रिय विषयों के सेवन में रचा-पचा रहता है, ऐसे आदमी को यह पता ही नहीं होता कि उसे आगे भी जाना है। जहां चेतना आसक्ति में निमग्न है, वैसे आदमी के जीवन में न तप दिखाई देता है, दम दिखाई देता और न ही नियम दिखाई देता है।
जीवन में तप, दम और नियम की बात बताई गयी है। स्वाद विजय की साधना तपस्या होती है। आसन विजय की साधना भी तपस्या होती है। विशेष साधक आसन विजय, निद्रा विजय और क्षुधा विजय करने वाले होते हैं। भोजन तो प्राणी को अपने जीवन को और देह को चलाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। शरीर से काम लेना है तो शरीर को भोजन के रूप में भाड़ा देना होता है। सामान्य मानव हो अथवा साधु, सभी को शरीर से कार्य करना है, विहार करना है, सेवा करना है तो शरीर को पोषण देने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। साधु के लिए बताया गया कि भोजन करने तो भी उसमें ज्यादा स्वाद लेकर नहीं करना चाहिए। अस्वाद की स्थिति होनी चाहिए। स्वाद विजय और उनोदरी भी तपस्या है। आसन विजय की भी साधना है। सोने, बैठने आदि में भी एक आसन में स्थित हो जाना भी साधना होती है। फिर निद्रा जय एक प्रकार की साधना है, किन्तु सामान्य मानव के लिए निद्रा की आवश्यकता होती है। उपयुक्त मात्रा में नींद, उपयुक्त मात्रा में भोजन आदि में संतुलन रखने का प्रयास करना चाहिए।
इन्द्रिय विजय की साधना को दम कहा गया है। इसी प्रकार मानव अपने जीवन में अनेक कार्यों को नियमित रूप से करने का नियम भी ले सकता है। मानव को अपने जीवन में तप, दम और नियम को जीवन में रखने का अभ्यास करना चाहिए तथा आत्मा को अध्यात्म से भावित करने का लक्ष्य रखने प्रयास और उस दिशा में पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री गजसुकुमाल मुनि के मोक्ष में जाने व उनके वियोग आदि प्रसंगों को आख्यान रूप में प्रदान किया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने आख्यान के इस क्रम को सम्पन्न करने की घोषणा भी की। अनेकानेक तपस्वियों ने अपनी-अपनी तपस्या का प्रत्याख्यान किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ महिला मण्डल के तत्त्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय तेरापंथ कन्या मण्डल के 20वें राष्ट्रीय अधिवेशन की ‘ज्योतिर्मय’ थीम के साथ समायोजित हुआ। इसके अंतिम मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में मंचीय उपक्रम रहा।
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