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आत्मा को बंधन से मुक्त बनाने वाला वीर व प्रशंसनीय : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री ने स्वयं के कल्याण के साथ दूसरों का कल्याण करने को किया अभिप्रेरित

अमृतवाणी का रसपान करने को निरंतर उमड़ रही श्रद्धालु जनता 

साध्वीवर्याजी ने भी जनता को किया उद्बोधित 

24.09.2024, मंगलवार, वेसु, सूरत (गुजरात) :


भारत की प्राचीन व्यापारिक नगरी, डायमण्ड सिटि, सिल्क सिटि के रूप में विख्यात सूरत शहर वर्तमान में आध्यात्मिक नगरी बनी हुई है। ताप्ती नदी के तट पर स्थित सूरत में आध्यात्मिकता की अलख जगा रहे हैं जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें देदीप्यमान महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमण। उनके दर्शन तथा उनकी अमृतवाणी का श्रवण करने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम निरंतर जारी है। सूरतवासियों की ओर से की गई विशाल और भव्य चातुर्मासिक व्यवस्थाएं बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को आह्लादित करती हैं। पर्युषण के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में देश के विभिन्न हिस्सों से लोग संघबद्ध रूप में दर्शनार्थ उपस्थित हो रहे हैं। 

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को महावीर समवसरण में उपस्थित जनता को ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आदमी की प्रशंसा भी होती है। जो आदमी अच्छा कार्य करता है, वह प्रशंसा का पात्र बन जाता है। वह वीर प्रशंसनीय होता है जो बंधे हुए व्यक्तियों को मुक्त कर देता है। 

अनेक संदर्भों में आदमी वीर हो सकता है। निर्भीक होकर मोर्चा संभालने वाला सैनिक भी वीर होता है, साधुता की दीक्षा स्वीकार करने वाला भी वीर होता है। मनुष्य जन्म, श्रुति धर्म, श्रद्धावान हो जाना और संयमवीर्य हो जाना कठिन बताया गया है। वह आदमी वीर होता है, जो संयम के पथ पर आगे बढ़ने का प्रयास करता है। 

साधुता का स्वीकरण भी मानों एक धर्मयुद्ध है। भौतिकता की चकाचौंध को छोड़कर संयम की साधना और आत्मा के कल्याण के पथ पर आगे बढ़ना भी बहुत बड़ी बात होती है। यहां धर्मयुद्ध होता है, जिसमें साधक अपनी कामनाओं, वासनाओं, कषायों पर विजय प्राप्त करने हुए अपने आत्मा पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह संग्राम में विजयी होने से वाले भी बड़ा योद्धा होता है, महावीर होता है। अपनी आत्मा को काम, क्रोध, लोभ व मोह से अपनी आत्मा को मुक्त कराने वाला वीर होता है और वह प्रशंसनीय भी होता है। जो दूसरों की आत्मा को पापों से मुक्त कराता है, स्वयं तरते हुए दूसरों को तारने वाला प्रशंसनीय होता है। 

युगप्रधान आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त उपस्थित जनता को साध्वीवर्या साध्वी सम्बुद्धयशाजी ने भी मंगल प्रेरणा प्रदान की। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी मानव हितकारी संघ राणावास संस्था के अध्यक्ष श्री मोहनलाल गादिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। संस्था से जुड़ी छात्राओं ने गीत का संगान किया। 

इस संदर्भ में आचार्यश्री ने आशीष प्रदान करते हुए कहा कि राणावास में परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी का चतुर्मास हुआ था। वहां इतना शिक्षा का कार्य हो रहा है। वहां खूब अच्छा होता रहे।  

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