02.08.24, सूरत। परम पूज्य आचार्यप्रवर की मंगल सन्निधि में व जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में २५ जुलाई से ०२ अगस्त तक उपासक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन हुआ। इसमें करीब ४४ व्यक्ति संभागी बने।
उपासक प्रशिक्षण शिविर का आज मंचीय कार्यक्रम रहा। इस संदर्भ में शिविर के व्यवस्थापक श्री जयंतीलाल सुरणा व नवयुवक उपासक श्री दीक्षित बापना ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के महामंत्री श्री विनोद बैद ने इस संदर्भ में अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। इस दौरान उपासक श्रेणी की ओर से वार्षिक विवरण समर्पित की गयी।
परम पूज्य आचार्यप्रवर ने इस संदर्भ में कहा 'उपासक श्रेणी के प्रशिक्षण शिविर का प्रसंग है। परमपूज्य आचार्यश्री तुलसी के आचार्यकाल में तेरापंथ धर्मसंघ में अनेक नए उन्मेष आए। उपासक श्रेणी भी उनमें एक है। प्रारम्भ में उपासक श्रेणी का रूप छोटा-सा था। वह बढ़ते-बढ़ते विस्तार को प्राप्त हुआ है। और भी विस्तार हो सकता है। केवल संख्या का ही नहीं, मैनेजमेंट का भी परिष्कार-विकास हुआ है। शिविर की व्यवस्था पहले भी चलती थी, अब तो कई वर्षों से परीक्षा आदि के रूप में संभवतः और ज्यादा परिष्कृत रूप हो गया है। गुणवत्ता भी बहुत ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात होती है। उपासक श्रेणी में तो उपासक उपासिकाएं हैं, वर्ष भर में जितना समय मिले, जितनी अनुकूलता हो, अपना व्यक्तिगत विकास करने का प्रयास होता रहे। अलग-अलग लगने वाले शिविरों के माध्यम से भी विकास हो सकता है। अध्ययन का अच्छा क्रम चले, वक्तृत्व कला आदि का सथन प्रशिक्षण प्राप्त हो। प्रशिक्षण चलता रहे, यह महत्त्वपूर्ण बात है। प्रशिक्षण के साथ अपनी साधना भी अच्छी चलती रहे।
कई जगह संथारे होते हैं, उनमें सभी स्थानों पर साधु-साध्वियां, समणियां नहीं जा पाएं तो उन्हें उपासक संथारे का प्रत्याख्यान करवा सकें, फिर उनको संभाल भी सके। संथारे के संदर्भ में मेरी एक पुस्तक भी है, उसको भी ध्यान में लिया जा सकता है। उस पुस्तक से भी संचारे के विषय में कई जानकारियां मिल सकती हैं। उपासक पर्युषण के लिए प्रायः जाते ही हैं। अन्य दिनों में लोकल में जो उपासक उपासिकाएं है, वे चारित्रात्माओं व समणियों की अनुपस्थिति में कुछ-कुछ व्याख्यान का क्रम चला सकते हैं। शनिवार की सायंकाल होने वाली सामायिक में तेरापंथ प्रबोध का संगान, उसका अर्थ आदि उपक्रम भी चलाए जा सकते है। इस प्रकार उपासक-उपासिकाएं लोकल में भी अपनी आध्यात्मिक धार्मिक सेवा देते रहें, अपना विकास करते रहें। कई उपासक-उपासिकाएं निर्धारित अवस्था के बाद निवृत्त हो जाते हैं तो कई नए लोग उपासक-उपासिका के रूप में प्रवृत्त भी हो, यह काम्य है। समय-समय पर प्रेरणा देकर लोगों को उपासक श्रेणी की ओर आकृष्ट किया जा सकता है।
उपासक श्रेणी परिचय एवं प्रगति विवरण- इस प्रकार की पुस्तकें कई वर्षों से सामने आ रही हैं। ऐसी पुस्तकों से पिछला रिकार्ड देखा जा सकता है। उपासक श्रेणी में जीवनदानी, समयदानी कार्यकर्ता हों तो अच्छी बात है कि धर्म के कार्य में कितना समय नियोजित करते हैं। उपासक श्रेणी में कई लोग अच्छे तत्वज्ञान वाले हो सकते हैं, ध्यान, योग के क्षेत्र में विकास करने वाले हो सकते हैं। प्रवक्ता, भाषण, प्रवचन करने वाले हो सकते हैं। अंग्रेजी भाषा में कहीं जैनिज्म व तेरापंथिज्म को प्रस्तुत करना हो तो वे कर सकें, ऐसा कुछ उपासक उपासिकाओं में अभ्यास रहना चाहिए। उपासक उपासिकाएं जैनिज्म व तेरापंथिज्म के प्रवक्ता बन सके, शास्त्रों की बातों की जानकारी रखने वाले बने, यह काम्य है।'
उपासक श्रेणी हमारे थर्मसंघ का एक अंग है, विभाग है। इन वर्षों में मर्यादा महोत्सव के अवसर पर उपासक श्रेणी का प्रायः गीत भी हो जाता है। बड़े शहरों में तो उपासक उपासिकाओं का एक समूह-सा हो जाता है। अच्छा क्रम, अच्छा विकास चलता रहे, अच्छा कार्य होता रहे।
उपासक श्रेणी तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में संचालित है। मानों महासभा की छत्री उपासक श्रेणी पर है। बहुत वर्षों से महासभा का योगदान रहा है। उपासक श्रेणी माहासभा के अंतर्गत हमारे धर्मसंघ की अच्छी, ठोस और निष्पत्ति वाली गतिविधि प्रतीत हो रही है। यह श्रेणी खूब विकास करती रहे।'
इस शिविर के विभिन्न सत्रों में पुरुषों को मुनि राजकुमारजी, मुनि दिनेशकुमारजी, मुनि योगेशकुमारजी, मुनि जम्बूकुमारजी (मिंजूर), मुनि आकाशकुमारजी, मुनि ध्रुवकुमारजी, मुनि सिद्धकुमारजी, मुनि सत्यकुमारजी, तथा महिलाओं को साध्वी जिनप्रभाजी, साध्वी मंजुलपशाजी, साध्वी वीरप्रभाजी, साध्वी श्वेतप्रभाजी, साध्वी मीमांसाप्रभाजी, साध्वी जितेन्द्रप्रभाजी, साध्वी कल्पयशाजी, साध्वी योगक्षेमप्रभाजी, साध्वी मयुरप्रभाजी, साध्वी समत्यप्रभाजी, साध्वी वैभवप्रभाजी एवं साध्वी रश्मिप्रभाजी ने प्रशिक्षण दिया। उपासक प्राध्यापक श्री डालमचन्द नीलखा, श्री निर्मलकुमार नौलखा, उपासक श्रेणी के राष्ट्रीय संयोजक श्री सूर्यप्रकाश सामसुखा आदि भी प्रशिक्षण कार्य में सहयोगी रहे।
उपासक श्रेणी को आशीष प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा उपासक श्रेणी के शिविर का यह क्रम है। परम पूजनीय आचार्यश्री तुलसी द्वारा अनेक नए उन्मेष आया था। हमारे धर्मसंघ में यह नया उन्मेष भी उनके समय ही आया था, वह आज विस्तार को प्राप्त हुआ है। उसमें और भी विस्तार हो सकता है। उपासक श्रेणी के ट्रेनिंग आदि का क्रम चलता रहे और अपनी साधना भी अच्छी चलती रहे। संथारे में पचखाना और संथारे में सहयोग देने के लिए तत्पर होना चाहिए। अच्छे तत्त्वज्ञानी, प्रेक्षाध्यानी, प्रवक्ता आदि के रूप में विकास हो। यह श्रेणी हमारे धर्मसंघ का विशेष अंग है। यह श्रेणी खूब विकास करती रहे, मंगलकामना।


0 Comments