- आचार्यश्री व आरएसएस प्रमुख की गरिमामय उपस्थिति में वाइस चांसलर कॉन्क्लेव का हुआ आयोजन
- देश के विभिन्न हिस्सों से अनेक वाइस चांसलर बने संभागी
- पर्यावरण संरक्षण पर आध्यात्मिक व भारत की पुरातन परंपराओं की ओर प्रस्थान पर हुई चर्चा
- अहिंसा और संयम की चेतना से पर्यावरण हो सकता है सुरक्षित : आचार्यश्री महाश्रमण
- पर्यावरण संरक्षण के लिए पूर्वजों की पद्धति की ओर लौटने की आवश्यकता : आरएसएस प्रमुख
17.10.24, संयम विहार, सूरत। सायंकाल चतुर्मास परिसर में बने कॉन्फ्रेंस हॉल में साढे तीन बजे से भगवान महावीर युनिवर्सिटि द्वारा पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में ‘हरित’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘वाइस चांसलर कॉनक्लेव’ का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से काफी संख्या में वाइस चांसलर उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारम्भ आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति-सूरत के अध्यक्ष श्री संजय सुराणा ने, पर्यावरण संरक्षण गतिविधि केन्द्र-रायपुर के राष्ट्रीय सह संयोजक श्री राकेश जैन ने आज के विषय पर अपनी अभिव्यक्ति दी।
तदुपरान्त आचार्यश्री ने उपस्थित वाइस चांसलरजन आदि को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि हमारे यहां पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, वनस्पति आदि सभी को जीव माना गया है। इसलिए इन सभी तत्त्वों के प्रयोग में संयम और अहिंसा की चेतना हो तो पर्यावरण की समस्या से बचा जा सकता है। शिक्षा विभाग की इतनी विभूतियों का एक साथ मिलना विशिष्ट बात है। शिक्षा से जुड़े हुए लोग विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कार के प्रति भी जागरूक करें। उनके मानसिक और भावात्मक विकास के लिए योग, ध्यान का भी अभ्यास हो, अहिंसा और संयम की चेतना का विकास हो तो पर्यावरण और समाज की सुरक्षा हो सकती है।
आरएसएस सरसंघचालक श्री मोहन भागवतजी ने भी अपने संबोधन में कहा कि दुनिया में पर्यावरण पर बात तो बहुत हो रही है, उसके लिए कुछ करने लायक बातों को आगे बढ़ाने का प्रयास हो। मनुष्य को विज्ञान नामक हथियार मिलने बाद वह अपनी कामनाओं के वशीभूत होकर मर्यादा का लंघन कर स्वयं को दुनिया का मालिक मान बैठा था, लेकिन आज विज्ञान भी मानने लगा है कि कोई ऐसी शक्ति है जो सृष्टि का संचालन कर रही है। प्रकृति के साथ चलने के बात बहुत पहले शंकराचार्यजी ने बताई थी। हमारे ऋषि, महर्षि ने इतनी सुन्दर व्यवस्था बनाई थी, उस ओर हमें पुनः धीरे-धीरे तर्कसंगत रूप में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। आप सभी गुरुजन यहां उपस्थित हैं तो बच्चों को उन पुरातन तथ्यों से अवगत कराएं और प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर चलने के लिए प्रेरित करें।


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