साधु की अकिंचतना ही उसका धन: सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण
सूरत के होमगार्ड्सों को शांतिदूत ने कराई संकल्पत्रयी
साध्वीप्रमुखाजी व साध्वीवर्याजी ने भी जनता को किया संबोधित
आचार्यश्री ने जनता को अनुशासन दिवस पर दी स्वयं पर अनुशासन की करने की प्रेरणा
राजकोट में आगामी वर्धमान महोत्सव की आचार्यश्री ने की घोषणा
06.10.2024, रविवार, वेसु, सूरत (गुजरात)
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में रविवार को श्रद्धालु जनता के अलावा सूरत शहर के होमगार्ड्स के जवान भी काफी संख्या में उपस्थित थे। इसके बेंगलुरु से समागत ज्ञानशाला के ज्ञानार्थी भी उपस्थित थे। महावीर समवसरण में आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवर्याजी ने जनता को किया सम्बोधित किया। नित्य की भांति युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित विशाल जनमेदिनी को आध्यात्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत मंत्र जप का प्रयोग कराया।
तदुपरान्त सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को ‘आयारो’ आगम के दूसरे अध्ययन के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में धनवान व्यक्ति भी मिलते हैं और गरीब व्यक्ति भी मिलते हैं। कहीं विशाल अट्टालिकाएं होती हैं, कहीं झुग्गी-झोपड़ी तो कहीं कोई फुटपाथ पर भी सोने वाले देख सकते हैं। धनवत्ता व दरिद्रता एक दूसरे से विपरीत होती हैं। सधनता और निर्धनता सांसारिक संदर्भ में होती है। शास्त्रकार ने बताया है कि कौन दरिद्र होता होता और कौन धनवान होता है। साधु को तपोधन कहा गया है। साधु के लिए तप, योग, उपशम आदि साधु का धन होता है। निर्धन साधु वह होता है, जो आज्ञा में नहीं चलता है। तीर्थंकर की आज्ञा में नहीं चलने वाला साधु दरिद्र होता है। साधु के लिए आज्ञा है कि शब्द, कष्ट आदि सहन करो, निर्जरा करो, आहार का संयम हो। इस आज्ञा में चलने वाला साधु सधन साधु है और आज्ञा से दूर होने वाला साधु निर्धन और दरिद्र साधु हो जाता है।
आदमी को अपने जीवन में स्वयं पर अनुशासन करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी स्वयं को अनुशासित बनाएं। मन, वाणी और इन्द्रियों पर संयम है तो कल्याण की बात हो सकती है। संयम और तप से स्वयं को भावित बनाने वाला स्वयं का कल्याण कर सकता है। साधु की अकिंचनता ही उसका धन है। तपस्या साधु का धन होता है।
अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के छठवा दिन अनुशासन दिवस के रूप में समायोजित था। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि अनुशासन सभी के जीवन के लिए आवश्यक होती है। आदमी को स्वयं पर अनुशासन करने का प्रयास करना चाहिए, फिर दूसरों पर भी अनुशासन की बात हो सकती है। विद्यार्थियों के साथ कोई छोटा हो या बड़ा, सभी में अनुशासन होना चाहिए। निज पर शासन, फिर अनुशासन के सूत्र को आत्मसात करने का प्रयास होना चाहिए। अनुशासन को अपने जीवन में समुचित महत्त्व देने का प्रयास करना चाहिए।
उपस्थित जनता को साध्वीप्रमुखाजी ने उद्बोधित किया। सौराष्ट्र से आए लोगों ने आचार्यश्री के दर्शन किए तो आचार्यश्री ने राजकोट में वर्धमान महोत्सव करने की घोषणा की। बेंगलुरु से समागत श्री माणकचंद संचेती ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। बेंगलुरु ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी तथा ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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