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अष्टान्हिक पर्युषण पर्वराधना महाशिविर

09.09.24, सूरत। परम पावन आचार्यप्रवर के पावन सान्निध्य में पर्वाधिराज पर्युषण के कार्यक्रम आध्यात्मिक उत्ल्लास के साथ त्यागमय वातावरण में परिसम्पन्न हुए। आठ दिन अहोरात्र में बलने वाले कार्यक्रमों से महाशिविर का रूप बन गया। सूरत व आसपास के क्षेत्रों के प्रवासी हजारों श्रद्धालुओं और कुटीरों में पहले से सेवारत श्रद्धालुओं के सिवाय भारत के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पर्युषण पर्याराधना के संदर्भ में पूज्य सन्निधि में पहुंचे।

पश्चिम रात्रि में करीब ५.१५ बजे से पूज्यप्रवर की सन्निधि में अर्हतु स्तुति, जप, अर्हत्वन्दना, गुरुवन्दना और बृहत् मंगलपाठ का क्रम चला। प्रातः करीब ७.०० बजे से ७.५५ बजे के बीच यथावसर मुनि अनेकांतकुमारजी व मुनि जागृतकुमारजी ने प्रेक्षाध्यान का प्रयोग कराया। लगभग आठ बजे से मुनि रजनीशकुमारजी, मुनि मननकुमारजी, मुनि राहुलकुमारजी व मुनि निकुंजकुमारजी ने तात्त्विक विश्लेषण तथा ८.३० बजे से ६.०० बजे तक मुनि राजकुमारजी, मुनि नयकुमारजी, मुनि सुधांशुकुमारजी, मुनि ध्रुवकुमारजी व मुनि नमनकुमारजी ने आगम स्वाध्याय का क्रम संपादित किया। करीब नौ बजे से मुख्य प्रवचन कार्यक्रम प्रारम्भ हो जाता, जो करीब ग्यारह बजे के बाद तक चलता। मुख्य प्रवचन कार्यक्रमों का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी द्वारा किया गया। मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के उपरांत मुनि ध्यानमूर्तिजी पचावसर कायोत्सर्ग तथा मध्याह करीब डेढ़ बजे से साध्वी सुषमाकुमारीजी ने नमस्कार महामंत्र का जप व लगभग तीन बजे से साध्वी आरोग्पश्रीजी, साध्वी विशालपशाजी व साध्वी पुष्यप्रभाजी ने मैत्री, अभय और सहिष्णुता की अनुप्रेक्षा का प्रयोग कराया। करीब साढ़े तीन बजे से 'आध्यात्मिक संबोध' का उपक्रम रहा, जिसमें साध्वी शरदयज्ञाजी के वक्तव्य हुए। सायंकालीन गुरुवन्दना के पश्चात् मुमुसु बहनों के द्वारा 'महावीर समवसरण' में प्रतिदिन प्रतिक्रमण करवाया जाता तथा संवत्सरी के दिन सार्यकाल का प्रतिक्रमण तेरापंथ कन्या मण्डल-सूरत की कन्याओं ने कराया।

पर्युषण के प्रथम दिन से छठे दिन तक (तीसरे दिन को छोड़कर) अपराह करीब २ बजे से २.४५ बजे तक पूज्यप्रवर की मंगल सन्निधि में आगम वाचन का उपक्रम चला, जिसमें साधु-साध्वियों व समणियों की उपस्थिति रहती। इस अवसर पर आवक श्रविकाएं भी बड़ी संख्या में संभागी बनते। इस क्रम में दसवे आलिमं के चतुर्थ अध्ययन का वाचन हुआ। पूज्यप्रवर ने वाचन के अंतर्गत साधु-साध्वियों की जिज्ञासाओं को भी समाहित किया और विविध प्रेरणाएं भी प्रदान की।

प्राप्त जानकारी के अनुसार भगवती संवत्सरी के दिन संवम विहार परिसर में लगभग २०३२ अष्टप्रहरी, करीब ३३५ छह प्रहरी पौषध तथा लगभग ३८८८ चार प्रहरी पौषध हुए। इस प्रकार कुल ६२५५ पौषध हुए। प्रतिक्रमण के दौरान न केवल महावीर समवसरण जनाकीर्ण बना रहा, अपितु महाश्रमण समवसरण, प्रवचन पंडाल के आसपास के स्थानों, कुटीरों आदि में भी हजारों लोगों ने प्रतिक्रमण किया। इस प्रकार भगवती संवत्सरी सहित पर्युषण पर्व के अष्टाहिक कार्यक्रम अत्यन्त गरिमा, थार्मिक उत्साह और प्रभावकता के साथ आयोजित हुए।

पर्वाधिराज पर्युषण के दौरान अठाई और उससे अधिक दिनों की तपस्याएं भी सैंकड़ों की संख्या में हुई। भगवती संवत्सरी के पूर्ववती दिन तपस्वियों का नामोल्लेख किया गया, जिसमें करीब पौन घंटे का समय लग गया।

पर्वाधिराज पर्युषण के दौरान रात्रिकालीन कार्यक्रम करीब आठ बजे प्रारम्भ होता। जिसमें 'तेरापंथ की गौरवशाली आचार्य परंपरा' विषय पर मुनि कोमलकुमारजी, मुनि विनीतकुमारजी, मुनि अभिजितकुमारजी, मुनि आकाशकुमारजी, मुनि जागृतकुमारजी, मुनि पुनीतकुमारती, मुनि निकुंजकुमारजी, मुनि मार्दवकुमारजी, मुनि केशीकुमारजी, मुनि ज्योतिर्मयकुमारजी तथा मुनि ध्यानमूर्तिजी के वक्तव्य हुए तथा मुनि राजकुमारजी, मुनि मृदुकुमारजी, मुनि अनेकांतकुमारजी, मुनि नम्रकुमारजी, मुनि पार्श्वकुमारजी, मुनि ऋषिकुमारजी, मुनि रत्नेशकुमारजी, मुनि मेधावीकुमारजी व मुनि देवकुमारजी ने गीत का संगान किया। रात्रिकालीन कार्यक्रम का संयोजन मुनि वर्धमानकुमारजी ने किया।

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