८ अगस्त। ४ अगस्त को सिंधनूर में साध्वी लावण्यश्रीजी का प्रयाण हो गया। आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उनकी स्मृति सभा का उपक्रम भी रहा। इस अवसर पर साध्वीप्रमुखाजी ने कहा- 'आदरणीया साध्वीश्री लावण्यश्रीजी का जन्म दक्षिण भारत में हुआ, उनकी दीक्षा भी दक्षिण भारत में हुई। उनकी इच्छा थी कि मैं दक्षिण भारत की यात्रा करूं। आचार्यप्रवर ने उनकी प्रार्थना पर उन्हें दक्षिण भारत में विहरण करने का निर्देश दिया। गत कई वर्षों से वे दक्षिण भारत की यात्रा कर रही थीं। वे इस बार सिंधूनर में चतुर्मास कर रही थीं। साध्वीश्री लावण्यश्रीजी अपने आचार और विचार के प्रति सजग थीं। उनके भीतर संघ निष्ठा और गुरु निष्ठा थी। वे जहां कहीं चतुर्मास करतीं, श्रावक समाज को अच्छा संभालती थीं, अच्छे संस्कार देती थीं और तत्त्वज्ञान आदि की बातें सिखाती रहती थीं। वे दीक्षित होते ही साध्वीश्री सोहनांजी के पास रहीं। तब से लेकर साध्वीश्री सोहनांजी के प्रयाण तक मानों वे उनके तन का कपड़ा बनकर रहीं। उनके बाद उन्हीं के सिंघाड़े से साध्वी लज्जावतीजी का सिंघाड़ा बना दिया गया तो साध्वी लावण्यश्रीजी उनके साथ रहीं। साध्वी लज्जावतीजी के प्रयाण के बाद साध्वी लावण्यश्रीजी को सिंघाड़पति बनाया गया। साध्वियां कह रही थीं कि वे पैंतीस वर्ष तक अपने ग्रुप में कनिष्ठ साध्वी के रूप में रहीं। जब साध्वी लावण्यश्रीजी को अग्रगामी बनाया गया तो साध्वी सिद्धांतश्रीजी को उनके साथ रखा गया। आचार्यप्रवर ने अनुग्रह कर साध्वी दर्शितप्रभाजी को भी उनके साथ रखा। साध्वी लावण्यश्रीजी ने दोनों साध्वियों को अच्छे संस्कार दिए। दोनों ही साध्वियां उनके लिए बहुत अनुकूल थीं। साध्वी लावण्यश्रीजी का हेल्पिंग नेचर था। वे सेवा लेना कम और देना अधिक चाहती थीं। वे प्रकृति से भद्र थीं, विनम्र थीं। इस अवसर पर मैं साध्वी लावण्यश्रीजी की आत्मा के प्रति मंगलकामना करती हूं कि उनकी आत्मा ऊर्ध्वारोहण करती हुई अपनी मंजिल को प्राप्त करे।'
मुख्यमुनिश्री ने कहा- 'साध्वीश्री लावण्यश्रीजी ने बालवय में ही संयम स्वीकार किया। दीक्षा के कुछ ही समय बाद उन्हें साध्वी सोहनांजी के साथ नियोजित किया गया तो उन्होंने साध्वी सोहनांजी की लम्बे काल तक सेवा की और उसके बाद वे साध्वी लज्जावतीजी के साथ रहीं। उसके बाद परम पूज्य गुरुदेव ने उन्हें अग्रणी नियुक्त कर दिया। वे संसारपक्ष में दक्षिण भारत से संबद्ध साध्वी थीं। उन्होंने दो बार दक्षिण भारत की यात्रा की। वे स्वाध्यायप्रिया साध्वी थीं, आगम स्वाध्याय और मौन किया करती थीं। मैं मंगलकामना करता हूं कि साध्वी लावण्यश्रीजी की आत्मा शीघ्र मोक्ष को प्राप्त करे। मंगलकामना।'
परम पूज्य आचार्यप्रवर ने साध्वी लावण्यश्रीजी के संदर्भ में अपने मंगल उद्गार व्यक्त करते हुए कहा- 'प्राप्त जानकारी के अनुसार साध्वी लावण्यश्रीजी का जन्म वि.सं. २०१० में के.जी.एफ. के संचेती परिवार में हुआ। वि.सं. २०२६ में परम पूज्य गुरुदेवश्री तुलसी के मुखकमल से बेंगलुरु में उन्होंने साध्वी दीक्षा स्वीकार की। वे साध्वी सोहनकुमारीजी (छापर) और साध्वी लज्जावतीजी के साथ रही थीं। बाद में उन्हें खुद को अग्रणी के रूप में विहरण करने का अवसर मिला। वर्तमान में साध्वी सिद्धांतश्री और साध्वी दर्शितप्रभा-ये दो साध्वियां उनके साथ थीं। वि.सं. २०८१ की श्रावण अमावस्या की रात्रि में सिंधनूर (उत्तर कर्नाटक) में साध्वी लावण्यश्रीजी का प्रयाण हो गया। यह विशेष योग लगा कि जन्म कर्नाटक में, दीक्षा भी कर्नाटक में और प्रयाण भी कर्नाटक में हुआ। किसी चारित्रात्मा के जीवन के तीन महत्त्वपूर्ण प्रसंग कर्नाटक में होना विशेष बात है। साध्वी लावण्यश्रीजी का संयम पर्याय पचास से भी ज्यादा वर्षों का रहा। वे दक्षिण भारत में थी ओर दक्षिण भारत में ही उनका प्रयाण हो गया। पीछे दो साध्वियां रही हैं। वे खूब चित्त समाधि में रहें, मनोबल रखें, अच्छी सेवाभावना रखें, धर्मप्रभावना का प्रयास करती रहें, धर्मसंघ की यथासंभव खूब सेवा करती रहें, खूब अच्छा विकास करती रहें। साथ्वी लावण्यश्रीजी मुनिश्री दुलहराजजी स्वामी की संसारपक्षीया सगी भानजी थीं। साध्वी लावण्यश्रीजी की आत्मा के प्रति हमारी मंगलकामना कि उनकी आत्मा शीघ्र मोक्षश्री का वरण करे।' साध्वी लावण्यश्रीजी की स्मृति में चतुर्विध धर्मसंघ ने पूज्यप्रवर के साथ चार लोगस्स का ध्यान किया। स्मृतिसभा के क्रम में मुनि जितेन्द्रकुमारजी, साध्वी दर्शनविभाजी, साध्वी परागप्रभाजी और तेरापंथी सभा-सिंधनूर के मंत्री श्री आनंद जीरावला ने अपनी अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।
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