31.08.24, सूरत।
२७ अगस्त २०२४ को दिल्ली में शासनश्री साध्वी रतनश्रीजी (श्रीडूंगरगढ़) का अनशनपूर्वक प्रयाण हो गया। कार्यक्रम के दौरान उनकी स्मृतिसभा का उपक्रम रहा। इस अवसर पर परम पूज्य आचार्यप्रवर ने अपने मंगल उद्गार व्यक्त करते हुए कहा- 'प्राप्त जानकारी के अनुसार साध्वी रतनश्रीजी का जन्म वि.सं. १६६१ में श्रीडूंगरगढ़ के चोरड़िया परिवार में हुआ। उन्होंने वि.सं. २००८ में परम पूज्य गुरुदेवश्री तुलसी के मुखकमल से दिल्ली में साध्वी दीक्षा ग्रहण की। वे साध्वी गीरांजी (राजगढ़) व साध्वी कंचनकुमारीजी (उदयपुर) के साथ रही थी। वि.सं. २०२६ में उन्हें अग्रणी नियुक्त किया गया। उन्होंने कई ग्रन्थ कंठस्थ किए, अनेक आगमों का वाचन किया तथा नेपाल और भारत के सुदूर प्रान्तों की यात्रा की। वे साध्वी सुव्रतांजी और साध्वी जयप्रभाजी और साध्वी कुलबालाजी की संसारपक्षीया बहन तथा साध्वी सुमनप्रभाजी की संसारपक्षीया भुआ थीं। मैंने उन्हें 'शासनश्री' संबोधन से संबोधित किया। वे दिल्ली में प्रवासित थीं।
वि.सं. २०८१ श्रावण शुक्ला पंचमी तदनुसार अगस्त २०२४ को १०.२१ बजे उन्हें तिविहार संथारे का प्रत्याख्यान कराया गया और २६ अगस्त २०२४ को लगभग सार्य ७.४० बजे चौविहार संथारे का प्रत्याख्यान कराया गया। वि.सं. २०८१ भाद्रपद कृष्णा नवमी तदनुसार २७ अगस्त २०२४ को प्रातः करीब ८.२१ बजे अध्यात्म साधना केन्द्र, दिल्ली में वे कालधर्म को प्राप्त हो गई।
शासनश्री साध्वी रतनश्रीजी (श्रीडूंगरगढ़) वयोवृद्ध अवस्था में थी। उन्होंने यात्राएं भी की, उन्हें अग्रणी के रूप में विहरण करने का भी मौका मिला। करीब बावन वर्ष तो उनके अग्रणी काल के हो गए। करीब तिहत्तर वर्षों का उनका संयम पर्याय रहा और उनकी अवस्था लगभग नब्बे वर्ष की थी। उनकी दीक्षा भी दिल्ली में हुई और प्रयाण भी दिल्ली में हुआ। हमारा जब सन् २०२२ में दिल्ली में जाना हुआ, तब उनसे मिलना भी हुआ था। उनके साथ जो साध्वियां रही, उन्हें मौका मिला। मैंने साध्वी सुव्रतांजी के लिए कहा कि वे फिलहाल आज्ञा, धारणा, व्यवस्था का दायित्व संभालें। सभी साध्वियां चित्त समाधि में रहें और धर्म प्रभावना का यथासंभव खूब अच्छा कार्य करें। साध्वी रतनश्रीजी (श्रीडूंगरगढ़) की आत्मा ऊर्ध्वारोहण करते हुए शीघ्रातिशीघ्र मोक्षश्री का वरण करे।'
पूज्यप्रवर के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने साध्वी रतनश्रीजी (श्रीडूंगरगढ़) की स्मृति में चार लोगरस का ध्यान किया।
साध्वीप्रमुखाश्रीजी ने कहा- 'शासनश्री साध्वीश्री रतनश्रीजी को जब लगा कि चिकित्सा बहुत अधिक कारगर नहीं बन रही है तो उन्होंने आध्यात्मिक चिकित्सा को स्वीकार कर लिया और निर्णय कर लिया कि मुझे अनशन स्वीकार करना है। वे बार बहने थीं और चारों बहनों ने दीक्षा स्वीकार कर ली। साध्दीची रतनश्रीजी आगम निष्ठ साध्वी थी। उनके मन में आगम के प्रति श्रद्धा थी। आगमों का स्वयं भी पारायण करती रहती थीं और अपने पास रहने वाली साध्वियों को भी वाचना देती रहती थीं। वे गुरुनिष्ठ भी थीं। गुरुआज्ञा में परिवर्तन की बात कभी नहीं सोचती थी। अपने साथ में रहने वाली साध्वियों को बराबर यही संस्कार देती थीं कि गुरुदेव की दृष्टि के अनुसार ही कार्य करना है। उनका आचार भी अच्छा था। चतुर्मास के दौरान साथि वयों को दूर-दूर गोचरी भेजती और उनके आने के बाद भी ध्यान देती थीं कि निर्धारित मर्यादाओं का सम्यक् पालन हुआ है या नहीं। उन्होंने सुदुर प्रान्तों की पात्रा की, श्रावक-श्राविकाओं की अच्छी सार-संभाल करती थी। उनका व्याख्यान का क्रम नियमित चलता था। वे अच्छा गाती भी थीं। वे अप्रमत्त और जागरूक रहती थीं। वे सौभाग्यशाली रहीं कि जब गुरुदेव शासनमाता को दर्शन देने के लिए दिल्ली पधारे तो उस समय उनको भी गुरुदर्शन का अवसर मिल गया। उनके साथ दो और साध्वियां रहीं साध्वी कार्तिकप्रभाजी व साध्वी चिन्तनप्रभाजी। दोनों युवा साध्वियों ने भी उनकी खूब सेवा की, उनको चित्त समाधि पहुंबाई। आज के अवसर पर मैं शासनश्री साध्वी रतनश्रीजी के प्रति मंगलभावना करती हूं कि उनकी आत्मा ऊर्जारोहण करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करे।'
मुख्यमुनिश्री ने कहा- 'शासनश्री साध्वी रतनश्रीजी (श्रीडूंगरगढ़) ने आगमवाणी को सार्थक करते हुए किशोरावस्था में ही परम पूज्य गुरुदेव तुलसी से दीक्षा स्वीकार की। परम पूज्य गुरुदेव महाश्रमणजी ने उन्हें शासनश्री के अलंकरण से अलंकृत किया था। वे हमारे धर्मसंघ की लम्बेकाल तक अग्रणी साध्वी के रूप में विचरण करने वाली साध्वी रहीं।
वे लम्बे समय से दिल्ली में प्रवासित थीं। उनकी संसारपक्षीया बहन साच्ची फुलबालाजी और साध्वी जयप्रभाजी का दिल्ली में अनशनपूर्वक प्रयाण हुआ था और उन्होंने भी दिल्ली में संधारापूर्वक प्रयाण को प्राप्त किया। उनको उनको संसारपक्षीय बहन साध्वी सुव्रतांजी ने संथारा पचखाया। इस प्रकार चारों संसारपक्षीय बहनों का दिल्ली में प्रवास रहा। तीन साध्वीजी संथारे में प्रयाण कर गई। साध्वी रतनश्रीजी ने अपने तीनों मनोरथ पूर्ण कर लिए। अंतिम समय में संथारा ग्रहण कर समाधि मृत्यु का वरण किया। धर्मसंघ की ऐसी साध्वीजी की आत्मा के प्रति मंगलकामना करता हूं कि वे शीघ्र सिद्ध, बुद्ध व मुक्त बने।'
मुनि ध्यानमूर्तिजी, साध्वी अखिलयशाजी और साध्वी मुक्तिश्रीजी ने भी साध्वी रतनश्रीजी की स्मृति सभा में अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथी सभा, दिल्ली के अध्यक्ष श्री सुखराज सेठिया ने भी इस संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी।
मुनि दिनेशकुमारजी ने जानकारी दी कि परम पूज्य गुरुदेव की मंगल सन्निधि में १ से ३१ अगस्त तक सपाद कोटि जप अनुष्ठान का उपक्रम रहा, जिसमें १३०० से ज्यादा लोग संभागी बने। इस कारण पांच करोड़ से ज्यादा बार नमस्कार महामंत्र का जप हुआ।
0 Comments